Saturday, October 17, 2020

ग्रह तथा उपग्रह (Planet and Satellite)

 ग्रह (Planet) :- वे आकाशीय पिण्ड जो सूर्य के चारो ओर अपनी-अपनी कक्षाओं (Orbits) में परिक्रमण करते रहते हैं, ग्रह (Planet) कहलाते हैं |


सूर्य से दूरी के बढ़ते क्रम में ये ग्रह क्रमशः हैं –(1) बुध (Mercury), (2) शुक्र (Venus), (3) पृथ्वी (Earth), (4) मंगल (Mars), (5) बृहस्पति (Jupiter), (6) शनि (Saturn), (7) अरुण (Uranus), (8) वरुण (Neptune)

इस प्रकार बुध (Mercury) सूर्य के सबसे अधिक समीप और वरुण (Neptune) सबसे अधिक दूर है |

उपग्रह (Satellite) :- वे आकाशीय पिण्ड जो ग्रहों के चारो ओर परिक्रमण करते हैं, उपग्रह कहलाते हैं |

जैसे- चन्द्रमा पृथ्वी के चारो ओर परिक्रमण करता है, अतः यह पृथ्वी का एक उपग्रह है |



सौर परिवार या सौर मण्डल (Solar System) :- सूर्य, ग्रहों और उपग्रहों के इस परिवार को सौर परिवार या सौर मण्डल (Solar System) कहते हैं |

उपग्रह के प्रकार (Types of Satellite) :-

उपग्रह दो प्रकार के होते हैं –

1- भूस्थैतिक या तुल्यकाली उपग्रह (Geostationary Satellite) :- यह उपग्रह विषुवत (Equator) के लगभग 22223 (36000 Km) मील ऊपर 24 घण्टे में अपनी कक्षा में एक चक्कर पूरा कर लेता है | इसका परिक्रमण काल ठीक पृथ्वी की अक्षीय गति के परिक्रमण काल के बराबर होता है | जिसके कारण उपग्रह पृथ्वी पर खड़े प्रेक्षक को सदैव स्थिर प्रतीत होता है | ऐसे उपग्रह को भूस्थैतिक उपग्रह है |



उदाहरण :- INSAT-2B तथा INSAT-2C भारत के कृत्रिम भूस्थैतिक उपग्रह हैं | इनका उपयोग दूरदर्शन कार्यक्रमों, दूरभाषी संवादों व रेडियो संकेतों को दूर-दूर तक संचारित करने में किया जाता है |

2- ध्रुवीय उपग्रह (Polar Satellite) :- ये उपग्रह पृथ्वी तल से 500 किमी० से 8800 किमी० ऊँचाई तक की ध्रुवीय कक्षा में उत्तर से दक्षिण दिशा में चक्कर लगाते हैं |



इन उपग्रहों का उपयोग मौसम से जुड़ी जानकारी देने में, बादलों के चित्र लेने में, वायुमण्डल तथा ओजोन परत के बारे में सूचना प्राप्त करने में  किया जाता है | भारत के PSLV श्रेणी के सभी उपग्रह ध्रुवीय उपग्रह हैं |

ग्रहों की गति के कैपलर के नियम (Kepler’s Laws of Planetary) :-

कैपलर ने खगोलीय प्रेक्षणों के आधार पर सूर्य के चारो ओर ग्रहों की गति के बारे में तीन नियम प्रतिपादित किए जो निम्नलिखित हैं-

1- कक्षाओं का नियम (Law of Orbit) :- प्रत्येक ग्रह सूर्य के चारो ओर दीर्घवृत्तीय कक्षाओं (Elliptical Orbits) में गति करते हैं तथा सूर्य दीर्घवृत्तीय कक्षा के एक नाभि पर स्थित होता है |

 

2- क्षेत्रफलों का नियम (Law of Area) :- किसी भी ग्रह को सूर्य से मिलाने वाली काल्पनिक रेखा समान समयान्तरालों (t) में समान क्षेत्रफल (A) तय (Sweep) करती है अर्थात् ग्रह की क्षेत्रफलीय चाल नियत रहती है | इस नियम से स्पष्ट है कि जब ग्रह सूर्य से दूर होता है, तो ग्रह की चाल न्यूनतम तथा जब ग्रह सूर्य के समीप होता है, तब ग्रह की चाल अधिकतम होती है |



3- परिक्रमण या आवर्तकालों का नियम (Law of Periods) :- प्रत्येक ग्रह के परिक्रमण काल का वर्ग (T2) उस ग्रह की दीर्घवृत्ताकार कक्षा के अर्द्ध-दीर्घ अक्ष (Semi-major axis) की तृतीय घात (अर्थात् घन) के अनुक्रमानुपाती होता है |



अतः $ \left[ { T }^{ 2 }\quad \alpha \quad { a }^{ 3 } \right]$

उपग्रह की ऊर्जा (Energy of Satellite) :-

पृथ्वी के परितः परिक्रमण करते उपग्रह में स्थितिज व गतिज दोनों प्रकार की ऊर्जा होती है |

उपग्रह के पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र में रहने के कारण उसके पास स्थितिज ऊर्जा होती है | इसे 'U' व्यक्त करते हैं |

$\left[ U=-\frac{G{{M}_{e}}m}{{{\operatorname{R}}_{e}}} \right]$

जबकि उपग्रह के गतिमान होने के कारण गतिज ऊर्जा होती है | इसे 'K' से व्यक्त करते हैं |

$\left[ K=\frac { 1 }{ 2 } mv_{ 0 }^{ 2 }=\frac { 1 }{ 2 } \frac { G{ { M }_{ e } }m }{ { { { R } }_{ e } } } \right]$

अतः उपग्रह की कुल ऊर्जा, E=U+K

$=-\frac { G{ { M }_{ e } }m }{ { { { R } }_{ e } } } +\frac { 1 }{ 2 } \frac { G{ { M }_{ e } }m }{ { { { R } }_{ e } } }$

$\left[ E=-\frac { G{ { M }_{ e } }m }{ { { { R } }_{ e } } } \right]$

चूँकि उपग्रह की कुल ऊर्जा ऋणात्मक होती है, इसलिए यह पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र में बन्द कक्षा में परिक्रमण करता है | यदि उपग्रह को गुरुत्वीय क्षेत्र से पलायन कराना है, तो हमें उपग्रह की कुल ऊर्जा शून्य करनी होगी यानी हमें उपग्रह को $\frac { 1 }{ 2 } \frac { G{ { M }_{ e } }m }{ { { { R } }_{ e } } }$  ऊर्जा देनी होगी |

जब तक उपग्रह को यह अतिरिक्त ऊर्जा प्राप्त नहीं होगी, तब तक वह पृथ्वी से बंधा रहेगा | इस ऊर्जा को उपग्रह की बन्धन ऊर्जा (Binding Energy) कहते हैं |

अतः उपग्रह की बन्धन ऊर्जा $=+\frac { 1 }{ 2 } \frac { G{ { M }_{ e } }m }{ { { { R } }_{ e } } }$ 

उपग्रह का कक्षीय वेग (Orbital Velocity of Satellite) :-

किसी उपग्रह को अपनी कक्षा में घूमने के लिए आवश्यक न्यूनतम वेग उसका कक्षीय वेग कहलाता है |

माना m द्रव्यमान का एक उपग्रह पृथ्वी-तल से h ऊँचाई पर पृथ्वी के चारो ओर वृत्तीय कक्षा में परिक्रमण कर रहा है | तब ,

इसका कक्षीय वेग (v) -

$\left[ { { v }_{ { o } } }={ { { R } }_{ e } }\sqrt { \left( \frac { g }{ { { { R } }_{ e } }+h } \right) } \right] $

⇒उपग्रह के कक्षीय वेग का मान इसके द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता है |

पलायन वेग (Escape Velocity) :-

वह न्यूनतम वेग, जिससे किसी पिण्ड को पृथ्वी-तल से ऊपर फेकने पर वह पृथ्वी के गुरुत्वीय क्षेत्र से बाहर निकल जाए और पृथ्वी पर कभी वापस लौटकर न आ सकें, पिण्ड का पलायन वेग कहलाता है | इसे ve से प्रदर्शित करते हैं |

$\left[ { { v }_{ e } }=\sqrt { 2g{ { R }_{ e } } } \right]$

उपर्युक्त समीकरण से स्पष्ट है कि पलायन वेग (ve) पिण्ड के द्रव्यमान (m) पर निर्भर नहीं करता है और न ही प्रक्षेपण कोण पर |

उपर्युक्त समी० में g=9.8 मी०/से० तथा Re=6.4⨉108 मीटर रखने पर,

ve=11.2 किमी०/सेकेण्ड प्राप्त होता है |

अतः यदि हम किसी पिण्ड को 11.2 किमी०/सेकेण्ड के वेग से ऊपर की ओर फेक दें, तो पिण्ड पृथ्वी तल पर कभी वापस नहीं आयेगा |

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