कार्य (Work) :- “किसी वस्तु पर बल लगाकर उसे बल की दिशा में विस्थापित करने की क्रिया कार्य कहलाता है |''
⇒[ कार्य =बल ×बल की दिशा में विस्थापन ]
अतः कार्य होने के लिए बल और बल की दिशा में विस्थापन आवश्यक है | यदि किसी वस्तु पर बल लग रहा है, और वह बल की दिशा की दिशा में विस्थापित नहीं हो रही है, तो विज्ञान की भाषा में कार्य शून्य होगा |
कार्य एक अदिश राशि है तथा इसका S.I. पध्दति में मात्रक न्यूटन-मीटर या जूल होता है |
कार्य का व्यापक सूत्र (Extensive Formulae of work)
चित्रानुसार यदि किसी वस्तु पर क्षैतिज से θ कोण पर बल लगाने से वस्तु d दूरी क्षैतिज विस्थापित होती है |
d दूरी विस्थापन के लिए वस्तु पर किया गया कार्य-
W= विस्थापन की दिशा में कार्यरत बल⨉विस्थापन
=बल F का क्षैतिज घटक⨉विस्थापन
=Fcosθ⨉d
[ W=Fd cosθ ]
सामर्थ्य (Power)
किसी कर्ता या मशीन के कार्य करने की दर उस कर्ता या मशीन की सामर्थ्य अथवा शक्ति कहलाती है | इसे ‘P’ से व्यक्ति करते हैं |
$\Rightarrow Power=\frac{Work}{Time}$
$\Rightarrow \left[ P=\frac{W}{t} \right]$
सामर्थ्य का मात्रक (Unit of Power)-
अतः सामर्थ्य (Power) का मात्रक जूल-सेकेण्ड -1 अथवा वाट है | सामर्थ्य के अन्य बड़े मात्रक भी हैं जैसे किलोवाट (kW) तथा मेगावाट (mW)
⇒1 kW=1000 वाट या 103 वाट
⇒1 mW=1000000 वाट या 106 वाट
Note:- मशीनों की सामर्थ्य (Power) को अश्वशक्ति (Horse Power) में भी व्यक्त किया जाता है |
[ 1 अश्व शक्ति (H.P.)=746 वाट ]
कार्य के प्रकार (Type of work)
कार्य मुख्यतः तीन प्रकार के होते है-
(A) धनात्मक कार्य (Positive work) ⇒ जब वस्तु पर लगाए गए बल का विस्थापन बल की ही दिशा में होता है, तब बल द्वारा किया गया कार्य (Work) धनात्मक होता है |
उदाहरण :- जब कोई व्यक्ति किसी वस्तु को पृथ्वी सतह से ऊपर उठाता है, तब व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य धनात्मक होगा |
(B) ऋणात्मक कार्य (Negative Work) ⇒ वस्तु का विस्थापन वस्तु पर लगे बल के विपरीत दिशा में होता है, तब बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होता है |
उदाहरण :- जब हम पृथ्वी पर पड़ी किसी वस्तु को ऊपर उठाते है, तब पृथ्वी के गुरुत्वीय बल द्वारा वस्तु पर किया गया कार्य ऋणात्मक होगा |
(C) शून्य कार्य (Zero work) :- जब बल और विस्थापन एक दूसरे के लम्बवत होते हैं, तब बल द्वारा कृत कार्य शून्य होगा |
ऊर्जा की अभिधारणा (Concept Energy)
किसी भी वस्तु में कार्य करने की क्षमता, उस वस्तु की ऊर्जा को व्यक्त करती है | अर्थात् जिस वस्तु में कार्य करने की क्षमता जितनी अधिक होती है, उस वस्तु में ऊर्जा भी उतनी ही अधिक होगी |
उदाहरण :- रोड पर दौड़ती हुई कार, बन्दूक से निकलने वाली गोली, झरने से गिरता हुआ पानी, और पृथ्वी से ऊपर जाते हुए रॉकेट की गति आदि में इनकी गति के कारण इनमें कार्य करने की क्षमता होती है, अतः इन सब में ऊर्जा है |
ऊर्जा का मात्रक भी वही होता है, जो कार्य का मात्रक (जूल) होता है | यह भी एक अदिश राशि है |
गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy)
प्रत्येक वस्तु में उसकी गति के कारण उसमें गतिज ऊर्जा होती है | यदि कोई m द्रव्यमान की वस्तु v वेग से गति कर रही हो, तो
उसकी गतिज ऊर्जा होगी-
$\left[ K=\frac{1}{2}m{{v}^{2}} \right]$
स्थितिज ऊर्जा की अभिधारणा (Concept of Potential Energy)
चित्रानुसार m द्रव्यमान का एक लाल बॉक्स v वेग से गति करता हुआ, घर्षणरहित तल पर पड़ी एक स्प्रिंग से टकराता है, और स्प्रिंग को x दूरी तक दबाकर रुक जाता है, यानी बॉक्स का वेग शून्य हो जाता है |
टकराने से पूर्व बॉक्स की गतिज ऊर्जा $\frac{1}{2}m{{v}^{2}}$ होगी |
जब यह बॉक्स स्प्रिंग से टकराता है, तब स्प्रिंग x दूरी तक दब जाती है, और बॉक्स का वेग भी शून्य हो जाता है, अतः बॉक्स की गतिज ऊर्जा $\frac{1}{2}m{{v}^{2}}$ शून्य हो जाती है | चूकि हम जानते हैं, कि ऊर्जा का केवल रुपान्तरण होता है, ऊर्जा नष्ट नहीं होती है |
फिर बॉक्स की गतिज ऊर्जा का क्या हुआ ?
बॉक्स की गतिज ऊर्जा स्प्रिंग के दबने (सम्पीडन) में खर्च हुई, इस अवस्था (स्प्रिंग की दबने अथवा सम्पीडन की अवस्था) में स्प्रिंग में तनाव रहता है | स्प्रिंग तनाव को कम करने के लिए बॉक्स को धकेल कर बॉक्स को उतनी ही गतिज ऊर्जा प्रदान कर देती है |
अर्थात् बॉक्स ने अपनी गतिज ऊर्जा के कारण स्प्रिंग पर जितना कार्य किया, वह कार्य स्प्रिंग में उसकी विशेष अवस्था (सम्पीडन) के कारण स्थितिज ऊर्जा के रूप में जमा हो गया | और जब स्प्रिंग अपनी सम्पीडन की अवस्था से सामान्य अवस्था में आयी, तब स्प्रिंग के अन्दर जमा स्थितिज ऊर्जा बॉक्स को गतिमान करने में खर्च हो गयी |
अतः किसी वस्तु (जैसे-स्प्रिंग) में विशेष अवस्था अथवा स्थिति के कारण कार्य करने की जो क्षमता होती है, उसे वस्तु की स्थितिज ऊर्जा कहते हैं |
स्थितिज ऊर्जा के विभिन्न स्वरुप (Different forms of Potential Energy)
(1) प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा (Elastic Potential Energy) :- प्रत्यास्थता के गुण के कारण कोई भी स्प्रिंग खीचे जाने अथवा दबाए जाने का विरोध करती है | अतः जब किसी स्प्रिंग को खीचा अथवा सम्पीडित किया जाता है, तो स्प्रिंग की प्रत्यास्थता के विरुध्द कुछ न कुछ कार्य अवश्य ही करना पड़ता है | किया गया यह कार्य ही स्प्रिंग में प्रत्यास्थ स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है |
स्प्रिंग की प्रत्यास्थ स्थिति ऊर्जा, $\left[ U=\frac{1}{2}k{{x}^{2}} \right]$
जहाँ k= स्प्रिंग का बल नियतांक है |
x = स्प्रिंग में खिचाव
(2) गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा (Gravitational Potential Energy) :- चित्रानुसार एक m द्रव्यमान के पिण्ड को पृथ्वी तल से h ऊँचाई तक उठाया जाता है | पिण्ड को h ऊँचाई तक ले जाने के लिए हमें गुरुत्व बल (mg) के विरुध्द कार्य करना होगा और यह कार्य ही पिण्ड में स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है | जिसे उस वस्तु की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा कहते हैं |
अतः पिण्ड की गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा,
U=गुरुत्व बल के विरुध्द किया गया कार्य = पिण्ड का भार ⨉ ऊँचाई
$=mg\times h$
$\left[ U=mgh \right]$
Note – ऊपर सूत्र में पृथ्वी तल (h=0) पर गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा शून्य मानी गयी है | यदि पुनः पिण्ड स्वतन्त्रता-पूर्वक गिरे तो mgh परिमाण का कार्य प्राप्त होगा |
(3) वैद्युत् स्थितिज ऊर्जा (Electrical Potential Energy) :- यदि वैद्युत् क्षेत्र में कोई आवेशित वस्तु रखी है, तो वह भी गुरुत्वीय क्षेत्र की भाँती वैद्युत् बल का अनुभव करेगी | और वैद्युत् बल के प्रभाव से पिण्ड में कार्य करने की क्षमता का समावेश होगा | वस्तु के विशेष अवस्था (विद्युत् क्षेत्र में स्थित होने) के कारण ही कार्य करने की यह क्षमता होती है, इसलिए कार्य करने के इस क्षमता अथवा ऊर्जा को वैद्युत् स्थितिज ऊर्जा कहते हैं |
(4) चुम्बकीय स्थितिज ऊर्जा (Magnetic Potential Energy) :- चुम्बकीय क्षेत्र में स्थित किसी गतिशील आवेश या धारावाही चालक में चुम्बकीय बलों के कारण जो कार्य करने की क्षमता उत्पन्न होती है, उसे चुम्बकीय स्थितिज ऊर्जा कहते हैं |
(5) रासायनिक ऊर्जा (Chemical Energy) :- पदार्थों में उनकी विशेष परमाणविक संरचना (Atomic Structure) के कारण जो स्थितिज ऊर्जा निहित होती है, उसे रासायनिक ऊर्जा कहते हैं |
(6) नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy) :- पदार्थ के मूल कणों यानी प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन के नाभिक में रहने की विशेष अवस्था के कारण नाभिक में जो स्थितिज ऊर्जा निहित रहती है, उसे नाभिकीय ऊर्जा कहते हैं |
(7) द्रव्यमान ऊर्जा (Mass Energy) :- महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्स्टाइन के अनुसार, प्रत्येक पदार्थ के उनके द्रव्यमान के कारण उनमें ऊर्जा होती है, जिसे द्रव्यमान ऊर्जा कहते हैं |
यदि m द्रव्यमान को ऊर्जा में बदले तो हमें कुल ऊर्जा प्राप्त होगी-
[E=mc2]
जहाँ c=3⨉108 मी०/से० प्रकाश की चाल है |
ऊर्जा संरक्षण का सिध्दान्त (Principle of Conservation of Energy)
इस सिध्दान्त के अनुसार, “ऊर्जा को न ही उत्पन्न किया जा सकता है, और न ही नष्ट किया जा सकता है | इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है” विश्व की समस्त ऊर्जा का परिमाण सदैव स्थिर रहता है |
उदाहरण :- हम घरों में बल्ब या ट्यूबलाइट लगाकर विद्युत् ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में परिवर्तित कर लेते हैं |
(ii) सोलर सेल की मदद से हम सौर ऊर्जा को विद्युत् ऊर्जा में परिवर्तित कर लेते हैं |
(iii) डायनमो की मदद से यांत्रिक ऊर्जा करे विद्युत् ऊर्जा में बदला जाता है |





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